11. शैख़ निज़ार का काम: उन लोगों का जवाब जो उनके काम को उन पर लांछन का ज़रिया बनाते हैं

शैख़ निज़ार पर की गई आलोचनाओं में सबसे अजीब यह कोशिश है कि उन पर सिर्फ़ इसलिए लांछन लगाया जाए कि वे अपनी रोज़ी कमाने के लिए काम करते हैं। जैसा कि बताया गया है, शैख़ निज़ार शारीरिक रूप से कठिन काम करते हैं, जिससे वे हलाल रोज़ी कमाकर अपने परिवार और बच्चों पर ख़र्च करते हैं।

फिर भी कुछ लोगों ने इसी बात को उन पर लांछन का आधार बनाने की कोशिश की, और उनके काम की तुलना दर्स देने या इल्म हासिल करने और उसे फैलाने से जुड़ी दूसरी गतिविधियों से की। लगता है उनकी नज़र में अपनी रोज़ी कमाने और परिवार का पेट पालने के लिए कठिन नौकरी करना किसी न किसी तरह इंसान के मक़ाम को घटा देता है, चाहे वह तालिबे-इल्म हो या इल्म सिखाने वाला।

यह वाक़ई एक अजीब पैमाना है। कब से हलाल रोज़ी कमाना और अपने आश्रितों पर ख़र्च करना अहले इल्म के लिए कमी की बात हो गई? जायज़ काम किसी के इल्म, फ़ज़ीलत या मक़ाम को कम नहीं करता, और न ही पढ़ाने या इल्म हासिल करने का यह तक़ाज़ा है कि इंसान सम्मानजनक काम छोड़ दे और लोगों पर बोझ बन जाए।

बल्कि शैख़ निज़ार का अपने परिवार पर ख़र्च करने के लिए कठिन काम सहने को तैयार होना इस बात की दलील है कि वे लोगों से बेनियाज़ हैं और अपनी मेहनत से रोज़ी कमाने को तैयार हैं। इसमें शर्म की कोई बात नहीं। शर्म की बात तो यह है कि हलाल रोज़ी कमाने के एक सम्मानजनक ज़रिये को महज़ किसी आलिम पर लांछन गढ़ने की चाह में कथित ऐब बना दिया जाए।

संसाधन

हलाल रोज़ी कमाने के कारण उलमा पर लांछन लगाना कितनी हैरत की बात है (उदाहरण: शैख़ निज़ार अस-सूदानी)

शैख़ अबू अब्दुर-रहमान बिन मूसा अत-तूनिसी

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